Birsa Munda death anniversary; जानिये कौन थे आदिवासी नेता बिरसा मुंडा जिन्होने अंग्रेजो के छक्के छुरा दिये थे

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Birsa Munda Death Anniversary | Birsa Movement | Birsa Munda Jayanti | Bhagwan Birsa Munda|आज आदिवासियों के भगवान व महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा जी की जयंती हैं। मात्र 25 साल की ही उम्र में ही स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा ने अग्रेंजो के छक्के छुड़ा दिये थे। 

Birsa Munda Biography- 

भगवान बिरसा मुंडा वो हैं, जिन्होने अपने खून से आजादी की दास्ता लिखी थी। 09 जनवरी 1900 का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक ऐसा काला दिन है। जिसके पन्ने सैकड़ों झारखंडियों के खून से लिखा गया हैं। आज भी उस दिन को याद करके झारखंड आदिवासियों का खून खौल जाता हैं। और हर एक भारतवासी की आँखो में आंसू आ जाता हैं। 

बिरसा मुंडा कौन थे- 

स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा का जन्म आज के ही दिन 1875 में छोटा नागपुर में मुंडा परिवार में हुआ था। मुंडा एक जनजातीय समूह था जो छोटा नागपुर पठार में रहा करते थे। 1 अक्टूबर 1894 का वो दिन जिस दिन नौजवान नेता बिरसा मुंडा ने सभी मुंडाओं को इकठ्ठा कर अंग्रेजो से लगान माफी के लिए आन्दोलन (Birsa Movement) छेड़ दिया था। उनका ये आन्दोलन इतिहास के पन्नो में बिरसा आंदोलन के नाम से जाना जाता हैं।  

आपको बता दे कि 1895 में बिरसा मुंडा को गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो वर्ष जेल की सजा सुनाई गयी। लेकिन बिरसा और उनके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की मदद करने की ठान ली थी। उस क्षेत्र के लोग "धरती बाबा" के नाम से जाना जाता हैं और उनकी पूजा कि जाती हैं। 9 जून 2022 (Birsa Munda Death Anniversary) इतिहास का काला दिन जिस दिन अंग्रेजो द्वारा इस महान क्रांतिकारी की आवाज को हमेशा के लिए चुप कराने के लिए धीमा जहर दे दिया गया था। जिसकी वजह से उनकी बहुत ही कम उम्र में मृत्यु हो गयी। 

क्या हुआ था 9 जून 1990 के दिन-

 खूंटी के सइलरकब के डोंबारी बुरू पर हजारों की मात्रा में आदिवासी जुटे थे। जिनमें औरत-बच्चे सब थे़ वहां जल, जंगल और जमीन बचाने आदिवासियों का जुटान हो रहा था। डोंबारी बुरु की पहाड़ियां कड़ाके की ठंड में कोहरे की आगोश में अंग्रेजो के खिलाफ रणनीति बनायी जा रही थी। तभी ब्रिटिश पुलिस ने अचानक हमला कर दिया़। और चारों तरफ से पहाड़ी को घेर कर गोलीबारी शुरू कर दिया। जिसकी वजह से डोंबारी बुरू की पहाड़ियां खून से लाल हो गयी़।

 आदिवासियों ने काफी देर तक अंग्रेजों का मुकाबला किया़ था। आदिवासियों ने अदभुत वीरता और साहस का परिचय दिया़ सैकड़ों आदिवासी औरतें और नवजात बच्चे क्रूर अंग्रेजी हुकूमत की वजह से अपना जीवन गवा दिया। बिरसा मुंडा (veer birsa munda) के वीर योद्धाओं ने प्राणों की आहूति दी़ इसके बाद अंग्रेजों ने बिरसा मुंडा की तलाश तेज कर दी़ वह डोंबारीबुरु से किसी तरह निकल चुके थे। लेकिन वो अंग्रेजो से बच नहीं पाये। 

राजधानी के कोकर के डिस्टीलरी पुल के पास बिरसा मुंडा (Birsa Munda Freedom Fighter) की समाधि स्थल है। उस समय अंग्रेजो को भगवान बिरसा मुड्डा का इतना खौफ था कि उन्हें यहां अंग्रेजों ने रातो-रात ही जला दिया था। 

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