Chhath Puja 2022 Date; छट पूजा कब हैं और क्यो मनाया जाता हैं, जानिए

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Chhath Puja 2022/ Chhath Puja 2022 Date / Chhath Puja Vrat Katha 2022/ महापर्व छठ पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता हैं। छठ पूजा के दिन भगवान सूर्य व छठ माता की भी पूजा की जाती हैं। 

Chhath Puja 2022 Kab hai-

छठ पूजा कब हैं; महापर्व छठ पूजा कार्तिक मास के शुल्क पक्ष की षष्ठी को मनायी जाती हैं। चार दिनों का यह पर्व चतुर्थी से ही शुरू होकर सप्तमी की सबुह उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ खत्म होता हैं। ऐसी मान्यता हैं, कि इस दिन स्त्रियां निर्जला व्रत रहती हैं और शाम के समय डूबते हुए सूर्य को जल अर्ध्य देती व सुबह में उगते हुए सूर्य को उसके बाद वो अपना व्रत खत्म करती हैैं।  

2022 में छठ पूजा कब हैं-

इस बार छठ पूजा 28 अक्टूबर से 31 अक्टूबर (Chhath Puja Date 2022 ) तक मनायी जाएगी। इस दिन माता षष्ठी व भगवान सूर्य की पूजा करने से संतान प्राप्ति, संतान की दीर्घायु , स्वास्थ्य व्रती को सुख, सौभाग्य और समृद्धि की प्राप्ति होती हैं। छठ पूजा का पहला दिन नहाय खाय होता है। इस दिन स्नान के बाद घर की साफ-सफाई की जाती है और शाकाहारी भोजन किया जाता है। कई जगहो पर इस दिन लौकी खाने की परंपरा है। छठ पूजा के दूसरे दिन खरना में व्रती पूरे दिन का उपवास करती हैं। शाम के समय गुड़ की खीर, घी लगी हुई रोटी और फलों का सेवन करते हैं। 

खरना कब हैं (Chhath Puja 2022)-

ये छठ के दूसरे दिन मानाया जाता हैं। इस दिन स्त्रियां पूरे दिन निर्जला व्रत रहती हैं और शाम के समय व्रती महिलाएं मिट्टी के चूल्हे पर गुड़वाली खीर का प्रसाद बनाकर भगवान सूर्य को प्रसाद चढ़ाती हैं। और उसके बाद उस प्रसाद ग्रहण करती हैं। ये व्रत 36 घंटो का होता हैं। 

छठ पूजा सामग्री Chhath Puja Samagri- 

  • साड़ी या धोती 
  • बांस की दो बड़ी टोकरी
  • बांस या पीतल का सूप
  • गिलास, लोटा और थाली
  • पान और सुपारी
  • शहद
  • मिठाई
  • गुड़, गेहूं और चावल का आटा
  • दूध और गंगा
  • एक नारियल
  • 5 गन्‍ना
  • चावल
  • एक दर्जन मिट्टी के दीपक
  • धूपबत्‍ती, कुमकुम, बत्‍ती
  • पारंपरिक सिंदूर
  • ठेकुआ
  • चावल के लड्डू
  • चौकी
  • केले के पत्‍ते
  • केला, सेव, सिंघाड़ा, हल्‍दी, मूली और अदरक का पौधा
  • शकरकंदी और सुथनी
  • आपकी जितनी श्रद्धा हो उस हिसाब आप फल, फूल व मिठाई आदि माता षष्ठी व भगवान सूर्य को अर्पित कर सकते हैं। पूजा से संबंधित अन्य जानकारी के लिए आप इस पूजा को जो करता हैं उससे या किसी पंडित से सलाह ले सकते हैं। 

    छठ क्यो मनाया जाता हैं-

    इस पर्व के बारे में स्त्रोत रामायण, महाभारत काल से मिलता हैं। महाभारत काल में कहा जाता हैं, कि जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हार गये थे। तो द्रौपदी ने छठ का व्रत किया था। जिसके बाद उनकी सारी मनोकामना पूरी होगी। रामायण में ऐसी मान्यता हैं कि जब भगवान राम अयोध्या से लौटे थे तो दीवाली के छठे दिन माता सीता के साथ सरयू नदी के तट पर छठ का व्रत रखकर भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत (Chhath Puja) पूरा किया था। उसके बाद उन्होने राजकाज संभाला था।  

    छठ मईया कौन हैं व क्यो होती हैं उनकी पूजा-

    छठ पर्व का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी हैं। ऐसा बताया गया हैं कि,राजा प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी और इस वजह से वे हमेशा दुखी रहते थे। महर्षि कश्यप ने राजा से पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करने को कहा और यज्ञ समाप्त होने के बाद महारानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया था। दुर्भाग्यवश वह शिशु मृत पैदा हुआ। राजा प्रियव्रत उस मृत बालक को लेकर श्मशान में गए और वहाँ शव छाती से चिपकाकर आंखों से आंशुओं की धारा बहाने लगे। 

    छठ मईया की कहानी Chhath Ki Katha-

    तभी आकाश से एक विमान उतरा, जिसमें माता षष्ठी विराजमान थीं। राजा ने बालक को भूमि पर रख दिया और बड़े आदर के साथ उनकी पूजा और स्तुति की। जिसके बाद माता षष्ठी ने अपना परिचय देते हुए कहा,"मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री षष्ठी देवी हूं (छठ मैया कौन है)। मैं विश्व के सभी बालकों की रक्षा करती हूं और निःसंतानों को संतान प्राप्ति का वरदान देती हूं।" (छठ मैया किसकी बेटी है)

    इसके बाद देवी षष्ठी (छठ पूजा की कहानी क्या हैं) ने उस बालक को उठा लिया और उसे फिर से जीवित कर दिया। जबतक महाराज प्रियव्रत उस बालक की ओर देख ही रहे थे कि देवी उस बालक को लेकर आकाश में जाने लगी। यह देख राजा ने पुन: देवी की स्तुति की। देवी ने राजा से कहा, "तुम स्वायम्भुव मनु के पुत्र हो। तीनों लोकों में तुम्हारा शासन चलता है। तुम सर्वत्र मेरी पूजा कराओ और स्वयं भी करो। मैं तुम्हें कमल के समान मुखवाला यह मनोहर पुत्र प्रदान करूंगी और उसका नाम सुव्रत होगा।" 

    जिसके बाद राजा अपने मंत्रियो के साथ अपने राज्य को खुशी-खुशी लौट आये और माता षष्ठी की पूरी श्रद्धा के साथ पूजा की प्रत्येक मास में शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि के अवसर पर भगवती षष्ठी का महोत्सव यत्नपूर्वक मनाया जाने लगा। संतान जन्म के छठे दिन, इक्कीस वें दिन तथा अन्नप्राशन के शुभ समय पर यत्नपूर्वक देवी की पूजा की जाने लगी। और इस प्रकार राजा प्रियव्रत को माता षष्ठी की कृपा से पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। Chhath Mata Ki Kahani

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