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Joshimath History: जोशीमठ का इतिहास किसने बसाया से लेकर क्यो धस रही वहाँ की जमीने

Joshimath History / Joshimath Sinking Live Update / Joshimath Latest News / जोशीमठ का इतिहास जिसको कभी विष्णु भगवान के अवतार ने बसाया था। जो जोशीमठ कभी साधु-संतो की वजह से मशहूर था। अब वो उनपर पड़ने वाली दरारो की वजह से हर रोज सुर्खियों में छाया हुआ हैं। 

Joshimath History in Hindi-

उत्तराखंड के गढ़वाल के पैनखंडा परगना में समुद्र की सतह से 6107 फीट की ऊँचाई पर, धौली और विष्णुगंगा के संगम से आधा किलोमीटर दूर जोशीमठ की उत्पत्ति की कहानी उन्हीं आदि शंकराचार्य से जुड़ी हुई हैं। 

 केरल राज्य के त्रावणकोर के एक छोटे से गाँव में जन्मे आदि शंकराचार्य ने वेदान्त दर्शन के प्रसार-प्रचार के उद्देश्य से बहुत छोटी आयु में अपनी मलयालम जड़ों से निकल कर सुदूर हिमालय की सुदीर्घ यात्राएँ कीं और असंख्य लोगों को अपना अनुयायी बनाया था। 

शंकराचार्य को मिला था द्विव्य ज्ञान-

जोशीमठ की ऐतिहासिक महत्ता इस जन-विश्वास में निहित है कि आधुनिक हिन्दू धर्म के महानतम धर्मगुरु माने जाने वाले आदि शंकराचार्य ने यहाँ शहतूत के एक पेड़ के नीचे समाधिस्थ रह कर दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ था। यही वजह हैं कि इसे ज्योतिर्धाम कहा गया। यह विशाल पेड़ आज भी फलता-फूलता देखा जा सकता है और इसे कल्पवृक्ष का नाम दिया गया हैं। लेकिन अब इस वृक्ष से लगा मंदिर भी टूट चुका है और वह गुफा भी ध्वस्त हो गई हैं। यहाँ पर ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गणेश, भृंगी, ऋषि, सूर्य और प्रह्लाद के नाम पर अनेक कुंड बना हुआ हैं। 

कई सम्राटो ने किया राज-

कत्यूरी सम्राट श्री वासुदेव गिरिराज चक्र चूड़ामणि उर्फ़ राजा बासुदेव ने इसे अपनी सत्ता का केंद्र बनाया था। जोशीमठ के मंदिर में रखी काले स्फटिक से बनी नृसिंह की मूर्ति के बारे में कहा जाता है कि उसका बायाँ हाथ हर साल कमज़ोर होता जाता है। बीबीसी रिपोर्ट के अनुसार एटकिंसन के मशहूर हिमालयन गजेटियर में सर एचएम एलियट के हवाले से फारसी इतिहासकार राशिद अल-दीन हमदानी के ग्रन्थ 'जमी-उल तवारीख' का उल्लेख करते हुए कत्यूरी राजा बासुदेव के बारे में लिखा हैं। 

कत्यूरों की राजधानी के जोशीमठ से बैजनाथ का कारण-

राजा वासुदेव का एक वंशज राजा शिकार खेलने गया हुआ था. उसकी अनुपस्थिति में मनुष्य का वेश धरे भगवान नृसिंह उसके महल में भिक्षा मांगने पहुँचे.

रानी ने उनका आदर सत्कार किया और भोजन करा कर राजा के पलंग पर सुला दिया. राजा वापस लौटा तो अपने बिस्तर पर किसी अजनबी को सोता देख कर आग बबूला हो गया और उसने अपनी तलवार से नृसिंह की बांह पर वार किया.

बांह पर घाव हो गया जिससे रक्त के स्थान पर दूध बहने लगा. घबरा कर राजा ने रानी को बुलाया जिसने उसे बताया कि उनके घर आया भिक्षु साधारण मनुष्य नहीं भगवान था. राजा ने क्षमा माँगी और नृसिंह से अपने अपराध का दंड देने का आग्रह किया.

नृसिंह ने राजा से कहा कि अपने किए के एवज में उसे ज्योतिर्धाम छोड़ कर अपनी राजधानी को कत्यूर घाटी अर्थात बैजनाथ ले जाना होगा.

उन्होंने आगे घोषणा की, "वहाँ के मंदिर में मेरी जो मूर्ति होगी उसकी बाँह पर भी ऐसा ही घाव दिखाई देगा. जिस दिन मेरी मूर्ति नष्ट होगी और उसकी बाँह टूट कर गिर जाएगी, तुम्हारा साम्राज्य भी नष्ट हो जाएगा और दुनिया के राजाओं की सूची में से तुम्हारे वंश का नाम हट जाएगा."

इसके बाद नृसिंह ग़ायब हो गए और राजा को कभी नहीं दिखाई दिए लेकिन उनकी बात का मान रखते हुए राजा ने वैसा ही किया.

भगवान विष्णु ने दिया श्राप-

जनश्रुतियों में कत्यूरी राजा को मिले अभिशाप के आगे का हिस्सा यह माना जाता है कि स्वयं भगवान विष्णु ने कहा था कि जिस दिन मूर्ति का हाथ पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो जाएगा, बद्रीनाथ धाम का रास्ता सदा के लिए अवरुद्ध हो जाएगा क्योंकि तब नर और नारायण पर्वत एक दूसरे में समा जाएँगे और भीषण भूस्खलन होगा। इसके बाद बद्रीनाथ के मंदिर को जोशीमठ से आगे भविष्य बद्री नामक स्थान पर ले जाना पड़ेगा। 

एक दूसरे संस्करण में भगवान नृसिंह का स्थान आदि शंकराचार्य ले लेते हैं, जिनके साथ हुए धार्मिक विवादों के चलते कत्यूरी राजधानी को जोशीमठ से हटाया गया हैं। 

क्यो धसी जोशीमठ की जमीन-

बीबीसी रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिक और विशेषज्ञ बताते हैं कि जिस ढाल पर यह ऐतिहासिक नगर बसा हुआ है वह एक बेहद प्राचीन भूस्खलन के परिणामस्वरूप इकठ्ठा हुए मलबे के ढेर से बना है।

इसका अर्थ यह हुआ कि इस नगर के घर जिस धरती पर बने हुए हैं उसके ठीक नीचे की सतह पर ठोस चट्टानें नहीं, रेत, मिट्टी और कंकड़-पत्थर भर हैं. ऐसी धरती बहुत अधिक बोझ बर्दाश्त नहीं कर पाती और धंसने लगती है। इसके लिए  1976 में प्रकाशित की गई अपनी एक रिपोर्ट में कहा गया हैं कि जोशीमठ के इलाक़े में अनियोजित विकास किया गया तो उसके गंभीर प्राकृतिक परिणाम हों  सकते हैं। 

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