The Kashmir Files; कश्मीरी पंडितो के साथ 1990 में क्या हुआ था जिसकी वजह से उन्होने किया पलायन

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The Kashmir Files; 1990 में कश्मीरी पंडितो के साथ जो भी हुआ उनके साथ हुए नरसंहार को एक बार फिर से हरा कर दिया है, 'द कश्मीर फाइल्स' ने उस समय अपने ही देश से मजबूर होकर कश्मीरी पंडितो को पलायन करना पड़ गया। 1990 का असली सच क्या हैं, और क्या हुआ था वहाँ ऐसा जो कश्मीरी पड़ित पलायन के लिए मजबूर हो गये। 

क्या हुआ था 1990 में कश्मीर में-

The Kashmir Files से एक बार फिर से देश में कश्मीरी पड़ितो के साथ हुए अत्याचार की दर्दनाक कहानियो से लोग वाजिब हो रहे हैं। इससे पहले कई बार 1990 में जो कश्मीरी पड़ितो के साथ  हुआ उस पर फिल्म बने हैं। लेकिन किसी ने भी इतना ध्यान नहीं दिया और उनकी आवाज दबी की दबी रह गयी।

80 और 90 के दशक में कश्मीर से करीब 3.30 लाख कश्मीरी पंडितों का आंतक की वजह से पलायन हुआ था।  और करीब 31 साल बाद भी वह अपने घरों को लौट नहीं पाए हैं। ये कही और नहीं हुआ ये अपने ही देश में हुआ, भारत में अन्य जगहों पर भी लोगो के साथ अत्याचार हुआ  लेकिन कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार को सेक्युलर रहने और देश में समरसता लाने के नाम पर उन पर ध्यान नहीं दिया गया है. ये सच है कि माइनॉरिटीज़ के साथ बहुत बार, बहुत खराब व्यवहार हुआ है, लेकिन ये भी सच हैं कि कश्मीरी पंडितों के साथ भी उतना ही खराब व्यवहार हुआ है।

कही ना कही इसमें सिस्टम के साथ-साथ लोगो की भी गलती रही कि वो इसपर आवाज नहीं उठा पाये क्योकि कही ना कही इनपर आवाज उठाने से देश में मुसलानो के साथ भी गलत हो सकता हैं, लेकिन क्या इस तरह से कश्मीरी पड़ितो की आवाजो को दबा देना सही हैं। 

ये कहाँ सही हैं, कि जहाँ न्याय के क्रम में ये कहां से आ जाएगा कि जो ‘बहुसंख्यक’ है वो पीड़ित नहीं हो सकता और ‘अल्पसंख्यक’ गलत नहीं हो सकता? हमें बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक के चश्मे से देखना छोड़कर उनके लोकल व अपने मुद्दों को देखना शुरू कर देना चाहिए।

1990 की घटना क्यों हुई-

ऐसा नहीं की पहले से ही कश्मीर में पड़ितो की हालात खराब ये तब भी नहीं हुआ जब 1947 में भारत व पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ था। उस समय भी मुसलमान व पड़ितो के बीच मित्रता की कई कहानियाँ सुनने को मिलती हैं। ये तबसे शुरू हुआ जब रूस ने अफगानिस्तान पर हमला किया और अमेरिका उन्हे भगाने में व्यस्त था। तब वहाँ के लोगो को मुजाहिदीन बनाया जाने लगा. ये लोग अपने जान की परवाह किये बिना रूस के सैनिकों को मारना चाहते थे। इसमें सबसे पहले वो लोग शामिल हुए जो अफगानिस्तान की जनता के लिए पहले से ही समस्या थे। क्रूर, वहशी लोग. उठाईगीर और अपराधी. इन सबकी ट्रेनिंग पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में होने लगी. तो आस-पास के लोगों से इनका कॉन्टैक्ट होना शुरू हुआ और इनसे जुड़े वो लोग जो पहले से ही कश्मीर के लिए समस्या बने हुए थे। उनको भी प्रेरणा मिलने लगी।

धर्म के उठाईगीरों को मौका मिल गया और वो लोगो से कहने लगे कि हम पहले से ही कहते न थे कि कश्मीरी काफिर हमारे दुश्मन हैं और इन्हें यहां रहने न दिया जाए।कश्मीर में पंडित कभी भी 5% से ज्यादा नहीं थे। लेकिन कई जगहों पर क्लेम किया जाता है कि ये यहां पर 15-20% तक हुआ करते थे।

तो वही कानून व्यवस्था की गंभीर स्थिति को देखते हुए केंद्र में मौजूद इंदिरा गांधी सरकार ने फारूख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली राज्य सरकार को 1984 में बर्खास्त कर दिया। लेकिन साल 1989 आते-आते कश्मीरी पंडित सीधे तौर पर निशाने पर आ गए और इस बीच 14 सितंबर 1989 को प्रमुख हिंदू नेता टीका लाल टपलू की हत्या कर दी गई थी। जिसके बाद से पलायन तेजी शुरू हो गया और कश्मीरी पंडित इसीलिए टपलू की हत्या के दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाते हैं।

1990 में पलायन की वजह-

1989 में जब वी.पी.सिंह की सरकार आई और मुफ्ती मुह्म्मद सईद गृहमंत्री बने तब उन्होंने तीन-चार ऐसे फैसले लिए जिससे आतंकवादियों को हौसले बढ़ गया।

उनका पहला हौसला बढ़ाने वाला कदम मुफ्ती मुहम्मद सईद की बेटी रूबिया सईद का आतंकवादियों द्वारा किया गया अपहरण का मामला था।जब रूबिया सईद को छुड़वाने के लिए आतंकवादियों की रिहाई की गई। उस वक्त आतंकवादियों को लगा कि सरकार तो आसानी से झुक सकती है। 

तो वही दूसरा कदम यह उठाया गया है कि श्रीनगर शहर में मौजूद बीएसएफ के मौजूद मोर्चों को हटा दिया गया। और इसको हटाने के पीछे यह दलील दी गई कि इनसे लोगों को दिक्कतें हो रही हैं। जिस वजह से सुरक्षा व्यवस्था कमजोर हुई।

तो वही चरार-ए-शरीफ के लिए करीब एक लाख से ज्यादा लोगों के जुलूस को अनुमति दी गई। इससे भी पाकिस्तान के पक्ष में माहौल बन गया था।

जिसके बाद आतंकवादियो का हौसला बढ़ गया और मंदिरो पर हमला करने लगे तथा कश्मीरी पड़ितो पर अत्याचार करने लगे। 

-चौथा कदम यह था कि जो लोग आजाद कश्मीर की मांग कर रहे थे। उन लोगों को श्रीनगर स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ के ऑफिस जाने की अनुमति दी गई । इसका असर यह हुआ कि कश्मीर के एक बड़े वर्ग में यह संदेश गया कि भारत कश्मीर को छोड़ रहा है।

1990 में कश्मीरी पड़ितो का पलायन-

4 जनवरी 1990 को उर्दू अखबार आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन ने छपवाया कि सारे पंडित कश्मीर की घाटी छोड़ दें। अखबार अल-सफा ने इसी चीज को दोबारा छापा और चौराहों तथा मस्जिदों में लाउडस्पीकर लगाकर कहा जाने लगा कि पंडित यहां से चले जाएं अगर वो नहीं गए तो बहुत बुरा होगा।

जिसके  बाद अत्याचार बढ़ता ही चला गया लोगो की हत्यायें औऱ रेप के मामले बढ़ने लगे। कहते हैं कि पंडितो, यहां से भाग जाओ, पर अपनी औरतों को यहीं छोड़ जाओ – असि गछि पाकिस्तान, बटव रोअस त बटनेव सान (हमें पाकिस्तान चाहिए. पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ.) जिसके बाद गिरजा टिक्कू का गैंगरेप हुआ और फिर उन्हे मार दिया।

ऐसी घटनाये वहाँ पर बहुत हुई लेकिन रिकॉर्ड नहीं रहा। एक आतंकवादी बिट्टा कराटे ने अकेले 20 लोगों को मारा था। इस बात को वो बड़े घमंड से सुनाया करता था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट इन सारी घटनाओं में सबसे आगे रहा।

 सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 60 हजार परिवार कश्मीर छोड़कर चले गये। और उन्हें आस-पास के राज्यों में जगह मिली. जान बचाने की. कहीं कोई इंतजाम नहीं था। लेकिन 19 जनवरी 1990 को सबसे ज्यादा लोगों ने कश्मीर छोड़ा था। ऐसा कहा जाता हैं कि लगभग 4 लाख लोग विस्थापित हुए थे। लेकिन आंकड़ों के मुताबिक अभी लगभग 20 हजार पंडित कश्मीर में रहते हैं।


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