क्यों जल रही है दिल्ली?

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Pic credit twitter
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कुछ हिन्दू थे कुछ मुसलमान थे साजिस के जो भेट चढ़े वो नौजवान थे , जरा सोच कर तो देखो क्या उनमें से कोई एक नेता के संतान थे?

ये तो वही बात हुई कर कोई और रहा है भर कोई और रहा है इसमें नुकसान किसी धर्म का नही है इससे नुकसान आम आदमी का है, हमें ये समझना होगा कि इसमें नुकसान हर एक इंसान का है जो यहाँ रहता है, सीएए  और एनआरसी के खिलाफ दिल्ली में शुक्रवार देर रात से जारी प्रदर्शन और ज्यादा भयानक रूप ले लिया मंडे को मौजपुर में चल रहे विरोध-प्रदर्शन के बीच पथरबाजी में, पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) अमित शर्मा गंभीर रूप से जख्मी हो गए।

वहीं, अपना फर्ज निभाते हुए उन्हें बचाने के प्रयास में ही गोकलपुर के एसीपी के रीडर रतन लाल शहीद हो गए। बताया जा रहा है कि बुखार होने के बावजूद वह ड्यूटी कर रहे थे, उनके समेत 37 पुलिसकर्मी घायल हुए है हिंसा प्रभावित इलाके में धारा-144 लागु कर दिया गया है।

होम मिनिस्ट्री ने बताया साजिश

उधर होम मिनिस्ट्री ने इस पुरे घटनाक्रम को अमेरिकाके रास्ट्रपति ट्रम्प की इंडिया विजिट के मद्देनजर रखते हुए सुनियोजित साजिश करार दिया है हालात को देखते ग्रहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली में शीर्ष अधिकारियो की एक बैठक बुलाकर दिल्ली पुलिस की उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही के निर्देश दिए है।

सुप्रीमकोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट की इस वाकिये पर राय

सुप्रीम कोर्ट का मनाना है -पुलिस का तरीका प्रोफेशनल नहीं है उसे एक्शन नहीं लेने दिया जा रहा ब्रिटेन या अमेरिका की पुलिस को एक्शन के लिए क्या किसी की जरूरत होती है अगर कोई भड़काऊ बयान दे तो पुलिस को उस पर कार्यवाही करनी चाहिए।

दिल्ली उच्च न्यायालय- दिल्ली में हम एक  और 1984 नहीं होने देंगे, जो जेड सिक्योरिटी के साथ चलते है और ऊंचे ओहदे पर है, उन्हें लोगो तक पहुंचना चाहिए, ताकि कानून  अपना काम कर रहा है इसका भरोषा पैदा हो, अधिकारी भी प्रभावित इलाको में जाए।

सवाल अभी भी ये उड़ता है कि इसमें गलती किसकी है?

चाहे सुप्रिमकोर्ट हो हाई कोर्ट हो या गवर्नमेंट हो सबने अपनी-अपनी राए दे दी, पर सवाल अभी भी यही है कि इसमें गलती किसकी है, किसकी वजह से दिल्ली जो इंडिया की धड़कन है उसकी आज ये हालत है कि लोग अपने घरों से भी निकलने में डर रहे है प्रभावित इलाके में जहां ये दंगे हुए लोग काफी सहम से गये है ये वही दिल्ली है, जिसे दिल वालो का शहर कहा जाता था, आज उसकी ये हालत है की लोगो को अपने घरों से बाहर निकलने में डर लग रहा है|

कितनो की रोजी-रोटी छीन गयी कितनो की दुकानें जल गईं कितनी ही माओ ने अपने बच्चे खो दिए कितने घरों के चिराग बुझ गए, फिर भी कई लोग इस आग को भड़काने में लगे है अगर वक़्त रहते इनपर रोक लगा दी गई होती तो शायद आज  ऐसा न होता कोई भी गवर्नमेंट इसपर अभी सुनिश्चित नहीं कर पा रही कि अचानक से एक शांत प्रदर्शन इतना उग्र रूप कैसे ले लिया सोचने वाली बात है ये कि ऐसा क्या हुआ वहां जो अचानक से हालात इतने बिगड़ गए।

सियासत भी जारी है

यहां देश  की धड़कन दिल्ली धू-धू करके जल रही  थी और कुछ पार्टिया इसमें भी सियासत करने में लगे हुए है कांग्रेस की वर्किंग कमेटी की बैठक के बाद पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी में कहाँ, 'पुलिस 72 घंटे तक हाँथ पर हाँथ शेयर बैठो रही, लोगो की जान चली गई, जिनमे एक हेड कांस्टेबल की जान चली गई कई लोगो की गोली लगी है|

दिल्ली की गलियों में हिंसा जारी है , 'सोनिया में सवाल उठाया कि होम मिनिस्टर रविवार से कहाँ थे क्या कर रहे थे, उन्होंने मांग की अमित शाह की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देनी चाहिए सोचने वाली बात है यह दिल्ली के हालात खराब है और इनको होम मिनिस्टर का इस्तीफा चाहिए शांति बनाए रखने की अपील करने की जगह ये इस्तीफा की अपील कर रही इनको यहाँ भी राजनीति दिख रही आम जनता की जान और नुकसान नहीं ।

क्या ये हिंसा रोकी नहीं जा सकती थी ये भी एक सवाल उठता है

दिल्ली में हुई हिंसा पर क्या पहले ही कोई कारवाही करके इसको रोका नहीं जा सकता है अगर पहले ही 144 act लगा दिया गया होता तो शायद आज हेड कांस्टेबल और अंकित और न जाने कितनो की जान बच गयी होती कितने घायल न हुए होते, ये शांत प्रदर्शन आज हिंसा का रूप न लिया होता|

इससे पहले बॉम्बे में भी प्रदर्शन हुए पर वहां पर पुलिस और गवर्नमेंट ने अपना काम अच्छे से किया और शांति बनाए रखा ये काम दिल्ली में भी हो सकता था अगर पहले ही इसपर ध्यान दिया गया होता आज भले ही दिल्ली गवर्नमेंट ने हेड कांस्टेबल को 1 करोड़ रुपया दिया हुए हो या जॉब दे उनके फैमिली के किसी मेंबर को पर क्या इससे उनकी कमी पूरी कर पाएंगे पहले ही अगर गवर्नमेंट ने शांति से सबकी बात सुनी होती और समझाया होता या कोई कठिन कदम उठाया होता तो आज दिल्ली में भी शांति होती और दिल्ली ऐसे न जली होती।

क्या कसूर था इसमें आई.बी अफसर अंकित और हेड कांस्टेबल रतन सिंह और बाकि लोगो का जिनकी जान गयी

दिल्ली हिंसा में बीते दिन बुधवार तक चार शव मिल चुके है,इसमें से आई.बी के कर्मचारी अंकित का शव हिंसा प्रभावित इलाके चांदबाग से मिला है, अंकित के परिजनों को लगा वो लापता है इसकी रिपोर्ट उनके घरवालों ने पुलिस स्टेशन में लिखवाई और उनके घरवालों और उनकी माँ को क्या पता था की उनका बेटा इस हिंसा भरी नफरत में अपनी जान गवा चूका है, गलती किसी की भी रही हो सजा तो एक बेगुनाह को अपनी जान की कीमत देकर चुकानी पड़ी|

इसी तरह हेड कांस्टेबल जो बुखार होने के बावजूद भी अपना फर्ज निभाने के लिए ड्यूटी पर पहुँच गये उन्होंने ने भी अपनी जान गवा दी और नजाने कितने लोग इस हिंसा का शिकार हुए है, शायद अगर आज ये हिंसा न हुई होती तो ये अपने परिवार के साथ होते सोचने वाली बात है इसमें इनका क्या कसूर था जो इनको अपनी जान देनी पड़ी।

सोच कर देखो इसमें नुकसान किसका हुआ है

दिल्ली हिंसा में जान और माल का नुकसान आम आदमी का ही हुआ है, इसपर यही बात कही जा सकती है की सीएए या एनआरसी से किसी की नागरिकता गयी हो या न गई हो पर जान कितनो की चली गयी है

ये भी एक सोचने वाली बात है कि इसमें नुकसान आम जनता का ही हुआ कुछ तुश्जीवियो के भड़काने पर हम इतना भड़क गए कि अपनी ही देश की राजधानी को आग के हवाले कर दिया, कुछ राजनितिक लोगो ने फैलाया जो नफरत की राजनीति आज उसकी वजह से उनका कुछ नही गया नुकसान सबसे ज्यादा दिल्ली और वहां रहने वालों का हुआ है, सोच कर देखिए गा जरुर इससे किसका भला हुआ है और किसका नुकसान हुआ है न तो उनका भला हुआ जो इसका समर्थन कर रहे था न उनका जो उसका विरोध कर रहे थे नुकसान दोनों का हुआ जान भी गवानी पड़ी इसमें लोगो को और अपनी  रोजी रोटी भी गवानी पड़ी।

"सीएए या एनआरसी से किसी की नागरिकता गयी हो या न गई हो पर जान कितनो की चली गयी है सोच कर देखो"

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